बुधवार, 14 नवंबर 2018

ये पगली आँखें


Image result for free image of sexy eyes


पूर्ण परिपक्व मधुमास में,

मधुर मिलन सहवास में,

प्रिय- दर्शन के उल्लास में,

आनंदातिरेक से लबलबाए,

पलकों के गर्भ से निकल आए,

अश्रुजल में ख़ुद को,

धोती नहलाती आँखें।



आलसी साँसों को बुहारती,

उबासी भरी अंगड़ाई मरोड़ती,

बेसुध धड़कनों को धागे में पिरोती,

हर्षित ह्रदय में हार माला बनाती,

मंद-मंद मुस्काती आँखें।



श्रिंगार की भूखी- प्यासी,

प्रेम-महल की रखवाली दासी,

फूल- पत्तियों के रंग से,

संवरती अपने ही ढंग से,

सुंदर स्वप्नों को धर के,

काले मेघों से काजल भरके,

सजती-धजती आँखें।



प्रिय के अचक आगमन से,

भौंचक, घबराई अपूर्ण तैयारी से,

सकुचाई, सकपकाई, अकुलाई,

चौखट पर दुबकी दर्पण छुपाई,

सहज लज्जा से लजाती आँखें।



प्रिय के एकटक निहारने से,

व्याकुल व्योम के झरने से,

प्रेम-ज्वर से कंपकपाती,

स्पर्श-ताप से झुलसाती,

समर्पण करने को कसमसाती,

झुकती सर झुकाती आँखें।



प्रेम-आधार पर खड़ी हवेली में,

नजरों के आँख-मिचौली में,

नवजात चाँद-सी चितवन तले,

यौवन की नित पवन चले,

मधुशाला की बन मधुबाला,

मधु से भर- भर प्याला,

परोसती, पिलाती रसीली आँखें।



प्रेम-रस वर्षा में तर-ब-तर,

बाँहों में जकड़न का असर,

प्रेम प्याली में अधरों को रखती,

चोरी- चोरी कनखियाँ भरती,

मादक अधखुली आँखें।



रसिक रसपान में मदमस्त,

मल्लयुद्ध में होकर पस्त,

मतवाली मदहोश बेहोश,

होती जा रही खामोश,

बुदबुदाती, लडखडाती आँखें।



सरस-सलिल सरोवर में।

बालिकाएं मग्न हो जल-क्रीड़ा में,

संपिले कमल- डंठल तोड़ डराती,

खिलखिलाती हास्य- ध्वज फहराती,

वैसी ही चंचल शरारती आँखें।



झिझक कोहरे के हटते ही,

बादल लज्जा के छंटते ही,

प्रेमानंद से गदगद होकर,

फूल कलियों से लकदक होकर,

सजे सेज पर सवार होकर,

लरजती पसरती आँखें।



प्रेम-विनिमय व्यापार में,

तीव्र -प्रज्वलित अंगार में,

लुटती -लुटाती भष्म होती,

कामदेव-बाण वेधित होती,

युद्ध में धरासायी आँखें।



तृप्त क्षुधा संतुष्ट ह्रदय,

मीलों जैसे दुरी करके तय,

बेलौस, बेसुध पड़ी निढाल,

साध कर जैसे तीनो काल,

पड़ी निशब्द शिथिल आँखें।



सूर्यास्त बाद बंद होती पंखुडियाँ सी,

अँधेरा छाते बंद होती खिड़कियों सी,

धीरे -धीरे पलक भार से दबी,

तृप्त तृष्णा के भार से लदी,

सुस्ताती बोझिल आँखें।



थके- मांदे रात्रि का बीतता पहर,

भोर होते ही छोड़ना है शहर,

प्रिय के पहलु में लेटकर सोचती,

निंद्रा-नक्षत्र पर उतरती,

बलखाई अलसाई आँखें।



पलकों की चादर ओढ़कर,

सुखद-साधना में तल्लीन होकर,

बड़ी मुश्किल से अभी-अभी,

सोयी है ये पगली आँखें।

--क. बो.

मंगलवार, 13 नवंबर 2018

मुझको आँखें बंद कर लेने दो


अब और नहीं बस मुझको आँखें बंद कर लेने दो,

नब्ज ख़ुद रुक जायेगी बस साँसें बंद कर लेने दो।


Image result for free image of closed eyes









पता नहीं कोई रहता है या न रहता है,

दिल के भूले बिसरे गली चौबारों में।

आलाव बुझा-बुझा सा लगता है,

पर तपिश बाकी है राख ओढे अंगारों में।



सजना संवारना है क्या अब भी तुम्हें,

सिंगारदान तो धूल और जंग खा रहा है।

पुराने बिंदी काजल से रिझाओ मत उन्हें,

सिंगार की दूकान वो ख़ुद भी चला रहा है।



बेचैनी कैसी थी कि सो भी न सके सारी रात,

आँखें बस अभी लगी ही थी कि मुर्गे ने दी बांग।

बेवफाई के रंग रंगे मेंहदी लगे वो हाथ,

दफ़न कर सारे किस्से भरने लगे फ़िर से मांग।



क़समें न खाओ ऐ आने वाले जमाने के लोग,

क़समें वादों की भूल-भुलैया बहुत बड़ी है ये।

बस में नहीं रहता अब ये बड़ा ग़लत है रोग,

शिकायत आइना से करते कि परछाई नहीं उनकी ये।

_ क. बो.

रोता हूँ और कभी हँसता हूँ।

Image result for free image of face laughing and weeping

आ अब लौट जाएँ कि चलने का वक्त हो चला है,
जिंदगी ने सबकुछ देकर भी आंसुओं से छला है।

माँ-बाप छोड़ चले जब उम्र थी केवल सात,
रिश्तों का परायापन देखा होश सँभालने के साथ।

जैसे-तैसे चलता रहा फ़िर तन्हाई के रोग ने छुवा,
साँझ का ढलता सूरज रोज दे जाता है मुझको दुवा।

खुले आसमान में चाँद-तारों के बीच कुछ तलाशता हूँ,
अपने आप से बातें करता रोता हूँ और कभी हँसता हूँ।

बुलंदियों पे पैर रखने को देखे मैंने भी कई सपने थे,
मगर सीढियों में ताले मार गए वो जो मेरे अपने थे।

बुलाते हैं वो बस अब मातम के रोज अपने दर पे,
मैं कहाँ याद आता जब वो खुशी मनाते अपने घर पे।

--क. बो.

एक मुहूर्त है तू कहाँ है तू ?  कहाँ है तू ? कहाँ है तू ? मालिक मेरे, किधर है तू, नहीं मुझे खबर, डगर-डगर ढूंढे तुझे, भटक-भटक मेरी नजर। ...